Saturday, September 15, 2007

एम्प्लोयी-एम्प्लोयेर रिलेशन

ऐसा हर बार क्यों होता है कि जब आप किसी कंपनी मे काम कर रहे होते हैं वहा से सलैरी ले कर अपना घर बाड़ चला रहे होते हैं तब तक तो सब ठीक लगता है !! जहा आपको कोई दुसरी नौकरी मिली आपको अपने ऑफिस मे खोट दिखने लगता है , आप चौड़े हो केर जीने लगते हो सब से बहस करते हो , आपकी आवाज़ मे बुलंदी आ जाती है - कल का चूहा, शेर बन जाता है , आज हमारी भी कंपनी से कोई गया, गया क्या निकाला गया - अब फ़ाइनल सलैरी के वक़्त ये चूहा, शेर बन गया- मेरे केबिन मे आकर मुझसे भी बहस कि - कल को जो मुझसे नज़र चुराता था आज मेरे सामने बैठ केर छुट्टी कटने पेर बहस केर रहा था - कह रहा था आपने निकाला है - आप दो महिने कि सलारी एक्स्ट्रा दोगे - जबकि उससे इसीलिये निकाला क्यूंकि वो बिना बताए एब्सेंट रहता था - तीन तीन दिन ऑफिस से गायब रहता था - पुराना बन्दा है सोच केर निकाला नही - पर जब पानी सर से ऊपर गया तो चुप नही रह सकते -
जॉब चेंज करिये मगर अपने पुराने ऑफिस से रिलेशन खराब मत करिये, ऐसा कर के मत जाओ कि कल को मिलो तो मिलने का दिल ना करे - बाक़ी हम अपने चूहे को औल द बेस्ट कहते हैं- पर जानते हैं - अपनी आदत कि वजह से कल नए जगह से धक्का खायेगा- कम धक्के खाए इसिलए औल द बेस्ट !! रोहित आप प्लेसेमेंट एक्सपर्ट हो आप क्या कहते हो?

2 comments:

Rohit Sharma said...

aisa isliye hota hai guru, kyunki jis din company ko ek aisa banda milta hai jo abhi current employee sey aadhe daam pe kam karne ko taiyyar ho jaye to company bhi niklane se pehle nahin sochti.
Suddenly employer starts seeing all the negatives in the employee too.

Its nothing but called Give and Take relationship.
You will give till you take.
And you will get till you give.

The coin has two sides.
One you have seen other I am trying to show u.
Hope you see it too.

Luv
Rohit

alok said...

hmmmmm.....thoda thoda correct hai..per thoda biased bhi ....lolz